
भारत में दलहनी फसलों की मांग लगातार बढ़ रही है और उड़द ऐसी फसलों में शामिल है जो कम समय में अच्छा उत्पादन देकर किसानों को बेहतर लाभ दिला सकती है। उड़द न केवल आर्थिक दृष्टि से लाभकारी है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसकी जड़ों में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीव वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करते हैं, जिससे अगली फसल को भी लाभ मिलता है।
यही कारण है कि आज कई किसान उड़द की खेती (Urad ki kheti) को एक लाभकारी विकल्प के रूप में अपना रहे हैं। लेकिन अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए केवल बुवाई कर देना पर्याप्त नहीं है। सही किस्म का चयन, उचित पोषण प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण और समय पर रोग एवं कीट प्रबंधन अपनाना आवश्यक है। यदि खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाए, तो उड़द की फसल से बेहतर गुणवत्ता और अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है।
उड़द की खेती (Urad ki kheti) के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी
उड़द की फसल गर्म और हल्की नमी वाले मौसम में अच्छी होती है। इसकी अच्छी बढ़वार के लिए 15°C से 30°C तापमान उपयुक्त माना जाता है। बुवाई के समय 25°C से 35°C तापमान रहने पर बीज अच्छी तरह अंकुरित होते हैं और पौधों की शुरुआती वृद्धि बेहतर होती है। फसल पकने के समय 18°C से 25°C तापमान अनुकूल रहता है, जिससे दाने अच्छी गुणवत्ता के बनते हैं।
उड़द की फसल के लिए 50 से 75 सेंटीमीटर वर्षा पर्याप्त होती है, इसलिए खरीफ मौसम इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। लेकिन खेत में पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए, क्योंकि जलभराव से जड़ों को नुकसान पहुँच सकता है और रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है।
मिट्टी की बात करें तो नमक वाली, खारी और जलभराव वाली मिट्टी उड़द की खेती (Urad ki kheti) के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती। अच्छी पैदावार के लिए ऐसी दोमट या भारी मिट्टी, जो नमी को अच्छी तरह सोख सके और पानी की निकासी भी सही हो, सबसे बेहतर रहती है। सही मिट्टी और अनुकूल मौसम मिलने पर उड़द की फसल की बढ़वार अच्छी होती है और उत्पादन भी बेहतर मिलता है।
बीज की मात्रा और सही समय पर बुवाई
उड़द की अच्छी पैदावार के लिए सही समय पर बुवाई करना जरूरी है। खरीफ फसल के लिए बुवाई का सही समय जून के आखिरी सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक होता है। गर्मियों की फसल के लिए इसकी बुवाई मार्च से अप्रैल महीने में की जाती है। अर्द्ध पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी बुवाई 15 से 25 जुलाई तक की जाती है।
अच्छी बढ़वार के लिए पौधों के बीच उचित दूरी रखना आवश्यक है। खरीफ की फसल के लिए पंक्तियों में 30 सेंटीमीटर और पौधों में 10 सेंटीमीटर का फासला रखना चाहिए। रबी की फसल के लिए पंक्तियों में 22.5 सेंटीमीटर और पौधों में 4 से 5 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए।
बीज को 4 से 6 सेंटीमीटर गहराई पर बोना चाहिए। पहाड़ी इलाकों में बोई गई फसल की गुणवत्ता अच्छी होती है।
बुवाई के लिए केरा या पोरा विधि अपनाई जा सकती है या फिर बिजाई वाली मशीन से भी बुवाई की जा सकती है।
खरीफ में बुवाई के लिए 7 से 8 किलो बीज प्रति एकड़ प्रयोग करें, जबकि गर्मियों में बुवाई के लिए 19 से 20 किलो मोटा बीज प्रति एकड़ प्रयोग करना चाहिए।
बुवाई से पहले बीज को Tricho Pep H 4 ग्राम और TRIOMETHOXAM 30 10 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें और बाद में छांव में सुखाएं।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
मूंग दलहनी फसल होने के कारण अधिक नाइट्रोजन की जरूरत नहीं होती, लेकिन संतुलित पोषण देना जरूरी है।
सुझावित खाद मात्रा (प्रति एकड़):
- गोबर की सड़ी हुई खाद – 6–8 टन
- नाइट्रोजन – 10–15 किलो
- फॉस्फोरस – 20–25 किलो
- पोटाश – 15–20 किलो
बेहतर वृद्धि और उत्पादन के लिए अनुशंसित उत्पाद:
- AMINOFERT GOLD – पौधों की शुरुआती वृद्धि और जड़ों के विकास के लिए।
- FABIANA (Microbial NPK Consortium Liquid) – मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद।
- Bayani (Potassium Source Derived from Rhodophytes) – फूल और दाना भराव सुधारने के लिए।
खरपतवार नियंत्रण का महत्व
उड़द की फसल के शुरुआती 20 से 30 दिन खरपतवार नियंत्रण के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि इस समय खरपतवारों को नियंत्रित न किया जाए, तो वे पोषक तत्वों और नमी के लिए फसल से प्रतिस्पर्धा करते हैं। खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 2 दिनों के अंदर BULDAN 30 1 लीटर प्रति एकड़ को 100 से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
रोग प्रबंधन
| बीमारी | लक्षण | रोकथाम |
| पीला चितकबरा रोग | यह विषाणु रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है। पत्तों पर पीले और हरे रंग की धारियां पड़ जाती हैं और फलियां नहीं बनतीं। | सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए TRIOMETHOXAM 25 (Thiamethoxam 25% WG) 40 ग्राम प्रति एकड़ स्प्रे करें। जरूरत पड़ने पर 10 दिन बाद दूसरी स्प्रे करें। |
| पत्तों पर धब्बे | पत्तों पर धब्बे दिखाई देते हैं जिससे फसल की वृद्धि प्रभावित होती है। | TAL M-45 (Mancozeb 75% WP) 600-800 ग्राम प्रति एकड़ स्प्रे करें और 10 दिन के अंतराल पर 2-3 स्प्रे करें। |
हानिकारक कीट और उनकी रोकथाम
| कीट | नुकसान | रोकथाम |
| रस चूसने वाले कीड़े (तेला, चेपा, सफेद मक्खी) | ये कीट पौधों का रस चूसकर उनकी वृद्धि को प्रभावित करते हैं। | TRIOMETHOXAM 25 (Thiamethoxam 25% WG) 40 ग्राम प्रति एकड़ स्प्रे करें |
| तंबाकू सुंडी | पत्तियों और पौधों को नुकसान पहुंचाती है। | Fifty-O-5 (Chlorpyriphos 50% + Cypermethrin 5% EC) 400 ML प्रति एकड़ स्प्रे करें |
| बालों वाली सुंडी | पौधों को खाकर नुकसान पहुंचाती है। | Fifty-O-5 (Chlorpyriphos 50% + Cypermethrin 5% EC) 400 ML प्रति एकड़ स्प्रे करें |
| फली छेदक | फलियों में छेद करके भारी नुकसान पहुंचाता है। | SPINOVOLT (Spinosad 45% SC) 55-65 ML प्रति एकड़ स्प्रे करें |
| ब्लिस्टर बीटल | फूल और नई टहनियों को खाकर दाने बनने से रोकता है। | EMA-PEP 1.9 (Emamectin Benzoate 1.9% EC) 170ml प्रति एकड़ स्प्रे करें |
कटाई और संभावित उत्पादन
उड़द की फसल लगभग 70 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है। जब फलियां काली होने लगें और पत्तियां सूख जाएं, तब कटाई करनी चाहिए।
यदि किसान सही किस्म, संतुलित पोषण और उचित प्रबंधन अपनाते हैं, तो प्रति एकड़ 4 से 6 क्विंटल या उससे अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
अच्छी गुणवत्ता का उत्पादन बाजार में बेहतर मूल्य दिलाता है, जिससे किसान की आय में वृद्धि होती है।
निष्कर्ष
उड़द की खेती (Urad ki kheti) कम लागत में अधिक लाभ देने वाली फसल है, लेकिन अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक खेती पद्धतियों को अपनाना जरूरी है। सही किस्म, उचित बीजोपचार, संतुलित पोषण, खरपतवार नियंत्रण और समय पर रोग प्रबंधन से फसल की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
यदि किसान इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाएं, तो उड़द की खेती (Urad ki kheti) न केवल बेहतर उत्पादन दे सकती है बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाकर भविष्य की फसलों को भी लाभ पहुंचा सकती है।