
पिछले कुछ वर्षों में किसानों ने मौसम के बदलते स्वरूप को बहुत करीब से महसूस किया है। कभी मानसून देर से आता है, कभी बारिश कुछ दिनों में ही सीमित रह जाती है, तो कभी फसल की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था के दौरान लंबे सूखे अंतराल देखने को मिलते हैं। यही वजह है कि आज खेती में पानी की उपलब्धता केवल सिंचाई का विषय नहीं रह गई, बल्कि सीधे उत्पादन और लाभप्रदता से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है।
हाल ही में भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने वर्ष 2026 के दक्षिण पश्चिम मानसून के लिए सामान्य से कम वर्षा का अनुमान जारी किया है। विभाग के अनुसार इस वर्ष मौसमी वर्षा Long Period Average (LPA) के लगभग 90% रहने की संभावना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर क्षेत्र में सूखा पड़ेगा, लेकिन यह संकेत अवश्य है कि कई इलाकों में लंबे सूखे अंतराल, असमान वर्षा और नमी की कमी जैसी परिस्थितियां फसलों को प्रभावित कर सकती हैं।
ऐसे समय में अधिकांश किसान एक सामान्य कदम उठाते हैं। यदि फसल तनाव में दिखाई देती है तो उर्वरकों की मात्रा बढ़ा दी जाती है। लेकिन खेतों में अक्सर यह देखने को मिलता है कि अतिरिक्त उर्वरक देने के बाद भी पौधों की बढ़वार अपेक्षित नहीं होती, जड़ें कमजोर रहती हैं, फुटाव कम हो जाता है, पौधों का रंग फीका पड़ने लगता है और फूल तथा फल बनने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। यदि मिट्टी में पोषक तत्व मौजूद हैं, तो फसल कमजोर क्यों पड़ रही है?
इसका उत्तर केवल पोषक तत्वों की मात्रा में नहीं, बल्कि पौधे की उन्हें ग्रहण करने की क्षमता में छिपा हुआ है।
कम बारिश का मतलब हमेशा कम नमी नहीं होता
कई बार किसान कम वर्षा को सीधे कम मिट्टी नमी से जोड़कर देखते हैं, जबकि वास्तविक स्थिति इससे अधिक जटिल होती है।
मिट्टी की बनावट, जैविक कार्बन की मात्रा, जल धारण क्षमता और जड़ों का विकास यह तय करते हैं कि वर्षा के बाद मिट्टी कितने समय तक नमी को सुरक्षित रख पाएगी। उदाहरण के लिए, जैविक पदार्थों से भरपूर मिट्टी कम वर्षा होने पर भी अपेक्षाकृत अधिक समय तक नमी बनाए रख सकती है, जबकि हल्की और रेतीली मिट्टियों में नमी तेजी से समाप्त हो जाती है।
इसलिए कई बार समस्या केवल पानी की उपलब्धता नहीं होती, बल्कि पौधों की उस नमी और पोषक तत्वों तक पहुंच बनाने की क्षमता होती है जो मिट्टी में पहले से मौजूद हैं।
कम नमी का सबसे बड़ा असर जड़ों और राइजोस्फीयर पर पड़ता है
जब मिट्टी में उपलब्ध नमी कम होने लगती है, तब सबसे पहले जड़ों की सक्रियता प्रभावित होती है। जड़ों की वृद्धि धीमी पड़ जाती है और उनके आसपास मौजूद राइजोस्फीयर क्षेत्र में सूक्ष्मजीवी गतिविधियां भी कम होने लगती हैं।
राइजोस्फीयर वह क्षेत्र होता है जहां जड़ें, सूक्ष्मजीव और पोषक तत्व लगातार एक दूसरे के साथ क्रिया करते हैं। यही क्षेत्र पौधों के पोषण का सबसे सक्रिय केंद्र माना जाता है।
नमी कम होने पर फास्फोरस जैसे कम गतिशील पोषक तत्वों की उपलब्धता घटने लगती है। पोटाश की आवाजाही भी धीमी हो जाती है और कई सूक्ष्म पोषक तत्व जड़ों तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाते। परिणामस्वरूप पौधा एक साथ जल तनाव और पोषण तनाव दोनों का सामना करता है।
यही कारण है कि केवल उर्वरकों की मात्रा बढ़ाने से हमेशा अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।
ऐसी परिस्थितियों में जैविक सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकें क्यों महत्वपूर्ण हो जाती हैं?
कम वर्षा की परिस्थितियों में चुनौती केवल पोषक तत्वों की उपलब्धता की नहीं होती, बल्कि उनके प्रभावी उपयोग की भी होती है। कृषि वैज्ञानिक इसे Nutrient Use Efficiency (NUE) कहते हैं, अर्थात पौधा उपलब्ध पानी और पोषक तत्वों का कितना प्रभावी ढंग से उपयोग कर पा रहा है।
जब मिट्टी में नमी कम होती है, तो जड़ों की सक्रियता घटने लगती है, पोषक तत्वों की गतिशीलता कम हो जाती है और राइजोस्फीयर (जड़ों के आसपास का सक्रिय क्षेत्र) में होने वाली जैविक प्रक्रियाएं भी प्रभावित होती हैं। ऐसे में केवल अधिक उर्वरक डालना हमेशा बेहतर परिणाम नहीं देता।
यहीं पर Myco-Pep (Mycorrhiza GR), Phosphate Solubilizing Bacteria (PSB), Potassium Solubilizing Bacteria (KSB) और FABIANA (Microbial NPK Consortium) जैसी जैविक तकनीकें महत्वपूर्ण हो जाती हैं। ये सीधे बड़ी मात्रा में पोषक तत्व प्रदान नहीं करतीं, बल्कि जड़ों और मिट्टी के बीच की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को अधिक सक्रिय बनाकर पानी एवं पोषक तत्वों की उपलब्धता और अवशोषण दक्षता को बेहतर बनाने में योगदान देती हैं। परिणामस्वरूप फसल उपलब्ध संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग कर पाती है और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता विकसित करती है।
Mycorrhiza जड़ों की पहुंच को कैसे बढ़ाता है?
माइकोराइजा पौधों की जड़ों के साथ एक प्राकृतिक सहजीवी संबंध स्थापित करता है। जड़ों से जुड़ने के बाद यह अत्यंत महीन हाइफी का जाल विकसित करता है जो सामान्य जड़ों और रूट हेयर्स की पहुंच से कहीं अधिक क्षेत्र तक फैल सकता है। ये हाइफी मिट्टी के सूक्ष्म छिद्रों तक पहुंचकर पानी और पोषक तत्वों को खोजने का कार्य करती हैं। परिणामस्वरूप पौधे का प्रभावी अवशोषण क्षेत्र कई गुना बढ़ जाता है।
इसी सिद्धांत पर आधारित Myco-Pep (Mycorrhiza GR) जड़ों की कार्यक्षमता को मजबूत करने और पौधों को मिट्टी में उपलब्ध संसाधनों तक बेहतर पहुंच प्रदान करने में सहायता करता है।
PSB फास्फोरस की उपलब्धता क्यों बढ़ाता है?
कई कृषि मिट्टियों में फास्फोरस की कुल मात्रा पर्याप्त होती है, लेकिन उसका बड़ा भाग ऐसे रूप में बंधा रहता है जिसे पौधे सीधे उपयोग नहीं कर सकते। Phosphate Solubilizing Bacteria जैविक अम्लों और अन्य जैव रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से इन अविलेय फास्फोरस स्रोतों को अधिक उपलब्ध रूप में परिवर्तित करने में सहायता करते हैं।
PRISA (Phosphate Solubilizing Bacteria) इसी तकनीक पर आधारित है। हालांकि इसकी कार्यक्षमता मिट्टी की नमी, तापमान और सूक्ष्मजीवी सक्रियता पर निर्भर करती है, लेकिन अनुकूल परिस्थितियों में यह फास्फोरस उपयोग दक्षता को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
KSB पोटाश की भूमिका
पोटाश पौधों में जल संतुलन, एंजाइम सक्रियता और तनाव सहनशीलता से जुड़ा प्रमुख पोषक तत्व है।
लेकिन मिट्टी में मौजूद कुल पोटाश का बड़ा हिस्सा खनिज संरचनाओं में बंधा रहता है। Potassium Solubilizing Bacteria इन स्रोतों से पोटाश की उपलब्धता बढ़ाने में सहायता करते हैं।
KRISA (Potassium Solubilizing Bacteria) इसी जैविक प्रक्रिया को समर्थन देने के लिए विकसित किया गया है। पर्याप्त पोटाश उपलब्ध होने पर पौधे जल उपयोग दक्षता को बेहतर बनाए रख सकते हैं और प्रतिकूल परिस्थितियों में अपेक्षाकृत अधिक स्थिर प्रदर्शन कर सकते हैं।
Microbial NPK Consortium का क्या महत्व है?
कम वर्षा की परिस्थितियों में चुनौती केवल एक पोषक तत्व की नहीं होती। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश तीनों की उपलब्धता और उपयोग दक्षता प्रभावित हो सकती है। यहीं पर Microbial NPK Consortium उपयोगी साबित होते हैं। ये विभिन्न लाभकारी सूक्ष्मजीवों का समूह होते हैं जो राइजोस्फीयर क्षेत्र को अधिक सक्रिय बनाते हैं और पोषक तत्वों के चक्रण को बेहतर बनाने में योगदान देते हैं।
FABIANA (Microbial NPK Consortium) इसी सिद्धांत पर आधारित समाधान है, जिसका उद्देश्य मिट्टी और जड़ों के बीच पोषक तत्वों के आदान प्रदान को अधिक कुशल बनाना है।
क्या बायोफर्टिलाइज़र सूखे का समाधान हैं?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है।
कोई भी बायोफर्टिलाइज़र पानी का विकल्प नहीं हो सकता। यदि खेत में अत्यधिक सूखा हो और पौधों के लिए नमी उपलब्ध ही न हो, तो केवल सूक्ष्मजीवी उत्पाद फसल को बचा नहीं सकते। लेकिन जहां सीमित नमी उपलब्ध हो, वहां ये तकनीकें जड़ों की सक्रियता, पोषक तत्व उपयोग दक्षता और पौधों की तनाव सहनशीलता को बेहतर बनाकर फसल को प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में मदद कर सकती हैं।
यही कारण है कि आज इन्हें केवल जैविक उत्पाद नहीं, बल्कि Climate Smart Agriculture का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
निष्कर्ष
कम बारिश का असर केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं रहता। यह जड़ों की सक्रियता, राइजोस्फीयर की जैविक प्रक्रियाओं, पोषक तत्वों की उपलब्धता और फसल की उत्पादन क्षमता सभी को प्रभावित करता है।
ऐसी परिस्थितियों में केवल उर्वरकों की मात्रा बढ़ाना हमेशा समाधान नहीं होता। आवश्यकता उन तकनीकों की होती है जो पौधों को मिट्टी में पहले से मौजूद पानी और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग करने में सक्षम बनाएं।
Myco-Pep (Mycorrhiza GR), PRISA (Phosphate Solubilizing Bacteria), KRISA (Potassium Solubilizing Bacteria) और FABIANA (Microbial NPK Consortium) इसी दिशा में कार्य करते हैं। ये मिट्टी और जड़ों के बीच की दूरी को कम करने, पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने और फसल की तनाव सहनशीलता को मजबूत करने में योगदान देते हैं।
बदलती जलवायु और अनिश्चित वर्षा के दौर में खेती का भविष्य केवल अधिक उर्वरक डालने में नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग करने में छिपा है। यही वह क्षेत्र है जहां जैविक सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकें किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण सहायक बनकर उभर रही हैं।