
मूंगफली भारत की प्रमुख तिलहनी फसलों में से एक मानी जाती है। यह फसल तेल उत्पादन के साथ साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मूंगफली में प्रोटीन और तेल दोनों की मात्रा अधिक होती है, इसलिए इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है। भारत के कई राज्यों जैसे गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक और तमिलनाडु में इसकी खेती बड़े स्तर पर की जाती है।
मूंगफली की खेती कम लागत में अच्छा उत्पादन देने वाली फसल मानी जाती है। यदि किसान सही किस्म, संतुलित पोषण और समय पर फसल सुरक्षा अपनाएं, तो इससे अच्छा आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
मूंगफली की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु
मूंगफली गर्म जलवायु की फसल है। इसके बेहतर अंकुरण, पौध विकास और फलियों के निर्माण के लिए तापमान और नमी का संतुलन जरूरी होता है।
आवश्यक तापमान
- अंकुरण के लिए: 25°C से 35°C
- फसल वृद्धि के लिए: 20°C से 30°C
- कटाई के समय: 18°C से 25°C
वर्षा
- 50 से 75 सेंटीमीटर वर्षा इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
अत्यधिक बारिश या लंबे समय तक पानी भराव होने से जड़ गलन और फफूंद रोग बढ़ सकते हैं। इसलिए खेत में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होना जरूरी है।
मिट्टी का चयन
मूंगफली की खेती के लिए रेतीली दोमट और अच्छी जल निकास वाली मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। मिट्टी का pH मान 6.5 से 7 के बीच होना चाहिए। भुरभुरी और उपजाऊ मिट्टी में फलियों का विकास बेहतर होता है। भारी और सख्त चिकनी मिट्टी में फलियों का निर्माण प्रभावित होता है क्योंकि ऐसी मिट्टी में फलियों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिलती।
खेत की तैयारी
अच्छे उत्पादन के लिए खेत की तैयारी सही तरीके से करनी चाहिए। पिछली फसल की कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई करें ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए। इसके बाद 2 से 3 बार हैरो या कल्टीवेटर चलाकर खेत को समतल करें। बिजाई से पहले खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ 4 kg Myco-Pep (Mycorrhiza GR)मिलकार डालें जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और जड़ों का विकास मजबूत होता है।
बिजाई का सही समय
खरीफ मौसम में मूंगफली की बिजाई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह तक करना उपयुक्त माना जाता है। सिंचित क्षेत्रों में अप्रैल के अंत से मई तक इसकी बुवाई की जा सकती है। समय पर बिजाई करने से पौधों की वृद्धि समान रहती है और उत्पादन अच्छा प्राप्त होता है। बिजाई में अधिक देरी करने से पैदावार कम हो सकती है।
बीज की मात्रा और दूरी
मूंगफली की खेती के लिए लगभग 38 से 40 किलो बीज प्रति एकड़ पर्याप्त माना जाता है। फैलने वाली किस्मों में कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 22.5 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। गुच्छेदार किस्मों में 30 × 15 सेंटीमीटर दूरी उपयुक्त मानी जाती है। बीजों की बुवाई लगभग 8 से 10 सेंटीमीटर गहराई पर करनी चाहिए।
बीज उपचार का महत्व
मूंगफली की खेती में बीज उपचार बहुत जरूरी माना जाता है क्योंकि इससे जड़ गलन और मिट्टी जनित रोगों से बचाव मिलता है।
बिजाई से पहले बीजों को थिरम, कार्बेन्डाजिम या मैनकोजेब जैसे फफूंदनाशकों से उपचारित करना चाहिए। इसके बाद ट्राइकोडर्मा विराइड या स्यूडोमोनास फ्लोरोसेन्स जैसे जैविक उत्पादों से उपचार करने पर पौधों की शुरुआती सुरक्षा मजबूत होती है और जड़ों का विकास बेहतर होता है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
मूंगफली की फसल में संतुलित पोषण देना बेहद जरूरी होता है क्योंकि फलियों के विकास के दौरान पौधों को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है।
सामान्यतः प्रति एकड़ 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद और4 kg Myco-Pep (Mycorrhiza GR) डालें।
यदि खेत में जिंक की कमी दिखाई दे तो जिंक सल्फेट का प्रयोग करना लाभकारी रहता है।
खरपतवार नियंत्रण
मूंगफली की फसल में शुरुआती 40 से 45 दिन खरपतवार नियंत्रण के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इस दौरान खरपतवार पौधों से नमी और पोषक तत्व छीन लेते हैं जिससे उत्पादन प्रभावित होता है।
इसलिए समय पर निराई गुड़ाई करना जरूरी होता है। कुछ किसान शुरुआती अवस्था में खरपतवार नियंत्रण के लिए 600-700ml/acre BULDAN CS (Pendimethalin 38.7% CS) जैसे खरपतवारनाशकों का प्रयोग भी करते हैं।
सिंचाई प्रबंधन
मूंगफली की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन फूल आने और फलियां बनने के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी रहना जरूरी होता है।
सामान्यतः 2 से 3 सिंचाइयां पर्याप्त मानी जाती हैं। खेत में जलभराव की स्थिति से बचना चाहिए क्योंकि इससे जड़ सड़न और फफूंद रोग बढ़ सकते हैं।
मुख्य कीट और उनका नियंत्रण
| कीट | लक्षण | नियंत्रण | |
| चेपा |
|
PEPMIDA-17 (Imidacloprid 17.8% SL) का अनुशंसित मात्रा में छिड़काव करें। | |
| सफेद सुंडी | सफेद सुंडी जड़ों को नुकसान पहुंचाती है, जिससे पौधे कमजोर होकर सूखने लगते हैं। | FY-GRO 3 (Fipronil 0.3 % GR) 6-10kg/acre छिड़काव करें। | |
| बालों वाली सुंडी | यह कीट पत्तियों को तेजी से खाकर फसल को नुकसान पहुंचाता है। | PEPORA (Chlorantraniliprole 18.5% SC) 60ml/acre छिड़काव करें। | |
| दीमक |
|
BEHTAR (CHLORPYRIPHOS 20% EC) 450ml/acre छिड़काव करें। |
प्रमुख रोग और रोकथाम
| रोग | लक्षण | रोकथाम |
| टीका रोग | पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं जिससे पौधे की प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित होती है। | TAL M-45 (Mancozeb 75% WP) 600-800gm/acre छिड़काव करें। |
| जड़ गलन | यह रोग जड़ों को सड़ा देता है जिससे पौधे सूखने लगते हैं। | CLAUN (Carbendazim 12% + Mancozeb 63% WP) 700gm/acre छिड़काव करें। |
| कुंगी रोग | पत्तियों के नीचे जंग जैसे धब्बे दिखाई देते हैं। | DIZOXY (Azoxystrobin 18.2% + Difenoconazole 11.4% SC) 150-200ml/acre छिड़काव करें। |
कटाई और उत्पादन
जब पौधे पीले पड़ने लगें और पुराने पत्ते झड़ने शुरू हो जाएं, तब फसल कटाई के लिए तैयार मानी जाती है। कटाई के बाद फलियों को अच्छी तरह धूप में सुखाना जरूरी होता है ताकि उनमें नमी कम हो सके।
अच्छी देखभाल और संतुलित पोषण अपनाने पर किसान मूंगफली से बेहतर गुणवत्ता और अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। उत्पादन किस्म, मौसम और खेत प्रबंधन पर निर्भर करता है।
निष्कर्ष
मूंगफली की खेती किसानों के लिए कम लागत में अधिक लाभ देने वाली फसल साबित हो सकती है। यदि सही किस्म का चयन, संतुलित खाद प्रबंधन, समय पर सिंचाई और रोग-कीट नियंत्रण अपनाया जाए, तो इससे बेहतर उत्पादन और उच्च गुणवत्ता प्राप्त की जा सकती है।
आज के समय में वैज्ञानिक खेती तकनीकों और आधुनिक फसल प्रबंधन के साथ मूंगफली की खेती किसानों की आय बढ़ाने का एक मजबूत विकल्प बन चुकी है।