
भारत में तिलहनी फसलों में सोयाबीन की खेती (Soyabean Farming) का एक विशेष स्थान है। सोयाबीन न केवल खाने के तेल का मुख्य
स्रोत है, बल्कि पशु आहार और खाद्य उद्योग में भी इसकी बड़ी मांग है। सबसे अच्छी बात यह है कि सोयाबीन
कम समय में तैयार होने वाली फसल है और सही तरीके से खेती करने पर यह किसानों को अच्छी आमदनी
देती है।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सोयाबीन बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। यह
फसल मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाती है क्योंकि इसकी जड़ों में राइजोबियम जीवाणु नाइट्रोजन स्थिरीकरण का
काम करते हैं।
सोयाबीन की खेती (Soyabean Farming) के लिए भूमि और जलवायु
सोयाबीन खरीफ मौसम की फसल है और इसे मध्यम वर्षा की आवश्यकता होती है। 20°C से 30°C तापमान
सोयाबीन की अच्छी वृद्धि के लिए उपयुक्त माना जाता है। बहुत अधिक बारिश या जलभराव फसल के
लिए नुकसानदायक होता है।
मिट्टी की बात करें तो हल्की से मध्यम दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो, सोयाबीन के लिए सबसे
बेहतर रहती है। मिट्टी का pH 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। भारी और पानी रोकने वाली मिट्टी में जड़ सड़न
और रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
भूमि की तैयारी और बीज चयन
भूमि की तैयारी
खरीफ की पहली बारिश के बाद खेत की गहरी जुताई करें, ताकि खरपतवार नष्ट हो जाएं और मिट्टी भुरभुरी हो जाए। इसके बाद 2–3 हल्की जुताई कर खेत को समतल करें। अच्छी भूमि तैयारी से अंकुरण बेहतर होता
है और पौधों की जड़ें मजबूत बनती हैं।
बीज चयन
हमेशा प्रमाणित और रोगमुक्त बीज का ही उपयोग करें। बीज का आकार समान और दाने स्वस्थ होने
चाहिए। एक एकड़ में लगभग 30–35 किलो बीज की आवश्यकता होती है, जो किस्म और बुवाई विधि पर
निर्भर करता है।
बीज उपचार का महत्व
सोयाबीन की खेती (Soyabean Farming) में बीज उपचार बहुत जरूरी होता है। इससे शुरुआती अवस्था में लगने वाले फफूंदजनित
रोग और मिट्टी के कीटों से सुरक्षा मिलती है।
बीज उपचार के लिए उपयोगी उत्पाद:
● TRICHO-PEP V (Trichoderma viride) – बीज और मिट्टी को फफूंदजनित रोगों से बचाने के
लिए।
● BAREEK (Beauveria bassiana) – दीमक और सफेद गिडार जैसे मिट्टी के कीटों के नियंत्रण के
लिए।
बीज उपचार करने से पौधे स्वस्थ रहते हैं और खेत में पौध संख्या समान रहती है।
बुवाई का समय और तरीका
सोयाबीन की बुवाई का सही समय मानसून की पहली या दूसरी अच्छी बारिश के बाद होता है। आमतौर पर
जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक बुवाई की जाती है।
पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30–45 cm और पौधे से पौधे की दूरी 5–7 cm रखें। बीज को 3–5 cm की गहराई पर
बोना चाहिए। बहुत गहरी बुवाई से अंकुरण प्रभावित हो सकता है।
सोयाबीन की खेती (Soyabean Farming) में सिंचाई प्रबंधन
सोयाबीन मुख्य रूप से वर्षा आधारित फसल है, लेकिन बारिश की कमी होने पर सिंचाई जरूरी हो जाती है।
फूल आने, फल बनने और दाना भरने की अवस्था में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए। इन चरणों पर पानी
की कमी से उपज में भारी गिरावट आ सकती है।
ध्यान रखें कि खेत में पानी जमा न हो, क्योंकि जलभराव से जड़ सड़न और पीला मोज़ेक जैसे रोग बढ़ सकते
हैं।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
सोयाबीन संतुलित पोषण की मांग करती है। सही खाद प्रबंधन से पौधों की वृद्धि अच्छी होती है और दानों
का वजन बढ़ता है।
सुझावित उर्वरक मात्रा (प्रति एकड़):
● गोबर की सड़ी खाद – 8–10 टन
● Mycopep – 4 -8 किलो
● Crop Tiger – 2 किलो
बेहतर वृद्धि और गुणवत्ता के लिए उत्पाद:
● AMINOFERT 77 – जड़ों की मजबूती और पौधों की वृद्धि के लिए।
● FABIANA (Microbial-NPK Liquid) – मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए।
● Bayani (Potassium Source) – दाना भराव और गुणवत्ता सुधार के लिए।
सोयाबीन की खेती (Soyabean Farming) में कीट प्रबंधन
| श्रेणी | मुख्य कीट/रोग | प्रमुख लक्षण | नियंत्रण के लिए उत्पाद |
| कीट | गर्डल बीटल | तने पर छल्लेदार कटाव, पौधे का ऊपर से सूखना | PEPORA (Chlorantraniliprole 18.5% SC) / Fifty-O-5 (Chlorpyriphos 50% + Cypermethrin 5% EC) |
| कीट | तना मक्खी | तने के अंदर सुरंग, पौधे की बढ़वार रुकना | Fifty-O-5 (Chlorpyriphos 50% + Cypermethrin 5% EC) |
| कीट | सेमीलूपर | पत्तियों को खाकर जालीदार बनाना | PEPORA (Chlorantraniliprole 18.5% SC) |
| कीट | जैसिड (Jassid ) | पत्तियों के किनारों से पीला पड़ना, बाद में भूरा जलना, | Pepmida 70 (Imidacloprid 70% WG) |
| कीट | सफेद मक्खी | पत्तियों का पीला पड़ना, चिपचिपा स्राव, पीला मोज़ेक फैलाव | PEPMIDA 30 (Imidacloprid 30.5% SC) |
| रोग | जड़ सड़न) | जड़ों का गलना, पौधा गिरना | TRICHO-PEP V |
| रोग | पत्ती धब्बा रोग | पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे | Sulph – Pep, M-45, Dizoxy |
कटाई और भंडारण
सोयाबीन की फसल 90–110 दिन में तैयार हो जाती है। जब पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ने लगें और फलियाँ
सूखने लगें, तब कटाई करें। कटाई के बाद दानों को अच्छी तरह सुखाकर नमी रहित स्थान पर भंडारित करें।
निष्कर्ष
सोयाबीन की खेती (Soyabean Farming) सही तकनीक और प्रबंधन के साथ की जाए तो यह किसानों के लिए स्थिर और
लाभदायक फसल साबित होती है। संतुलित पोषण, समय पर बुवाई, बीज उपचार और कीट-रोग नियंत्रण से
उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है। जैविक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान
सोयाबीन से बेहतर आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।
Frequently Asked Questions (FAQs)
1. सोयाबीन की खेती के लिए कौन सी मिट्टी उपयुक्त है?
हल्की से मध्यम दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो।
2. सोयाबीन की बुवाई कब करनी चाहिए?
जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक।
3. एक एकड़ में कितना बीज लगता है?
लगभग 30–35 किलो।
4. बीज उपचार क्यों जरूरी है?
बीज उपचार से रोग और मिट्टी के कीटों से सुरक्षा मिलती है।
5. सोयाबीन में मुख्य कीट कौन से हैं?
गर्डल बीटल, सेमीलूपर, तना मक्खी और सफेद मक्खी।