
इलायची को मसालों की रानी कहा जाता है। इसकी खुशबू, स्वाद और औषधीय गुणों की वजह से भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इसकी भारी मांग रहती है। सही तरीके से की गई इलायची की खेती किसानों के लिए लंबे समय तक स्थिर और अच्छा मुनाफा देने वाला विकल्प बन सकती है। यह फसल थोड़ी देखभाल और समझदारी मांगती है, लेकिन एक बार पौधे जम गए तो कई वर्षों तक उत्पादन देती है।
भारत में केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु इलायची उत्पादन के प्रमुख राज्य हैं। पहाड़ी और अर्ध-छायादार क्षेत्रों में इसकी खेती सबसे सफल मानी जाती है।
इलायची की खेती (Elaichi Ki Kheti) के लिए भूमि और जलवायु
इलायची नम और ठंडी जलवायु की फसल है। इसे ज्यादा गर्मी या पाला दोनों पसंद नहीं हैं। 18°C से 30°C तापमान और 1500–2500 मिमी वार्षिक वर्षा इलायची के लिए आदर्श मानी जाती है। मिट्टी की बात करें तो अच्छी जल निकास वाली, जैविक पदार्थों से भरपूर दोमट या लेटराइट मिट्टी इलायची के लिए सबसे उपयुक्त रहती है।
मिट्टी का pH 5.0 से 6.5 के बीच होना चाहिए। भारी और पानी रोकने वाली मिट्टी में जड़ सड़न का खतरा बढ़ जाता है।
भूमि की तैयारी और पौध चयन
भूमि की तैयारी
इलायची लगाने से पहले खेत की अच्छी सफाई करें। झाड़ियां, खरपतवार और सूखी जड़ें हटा दें ताकि नमी और हवा का संतुलन बना रहे। ढलान वाली जमीन में मिट्टी कटाव रोकने के लिए मेड़ या कंटूर बंड बनाना फायदेमंद रहता है।
पौध चयन
हमेशा स्वस्थ और रोगमुक्त पौधों का ही चयन करें। पौधों की जड़ें मजबूत हों और पत्तियां हरी व ताजी दिखाई दें।
गड्ढों की तैयारी और रोपाई
इलायची की अच्छी बढ़वार के लिए गड्ढों की सही तैयारी बहुत जरूरी होती है। रोपाई के लिए 45 × 45 × 45 सेमी आकार के गड्ढे बनाएं। इस साइज के गड्ढों से पौधों की जड़ों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है और मिट्टी में नमी व हवा का संतुलन बना रहता है।
गड्ढों को भरते समय ऊपर की उपजाऊ मिट्टी में सड़ी हुई गोबर खाद मिलाकर भरें। गोबर खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाती है और पौधों को शुरुआती पोषण देती है, जिससे पौधे जल्दी जम जाते हैं।
रोपाई के समय TRICHO-PEP V (Trichoderma viride) का उपयोग करने से मिट्टी में मौजूद हानिकारक फफूंद का असर कम होता है और जड़ सड़न जैसी समस्याओं से पौधों की सुरक्षा होती है। साथ ही Myco-Pep (Mycorrhiza) देने से जड़ों की पकड़ मजबूत होती है और पौधे मिट्टी से पानी व पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से ले पाते हैं। इससे इलायची के पौधे स्वस्थ रहते हैं और आगे चलकर अच्छा उत्पादन देते हैं।
रोपाई का समय और तरीका
इलायची की रोपाई मानसून के दौरान, खासकर जून से अगस्त के बीच करना सबसे उपयुक्त होता है। इस समय मिट्टी में नमी पर्याप्त रहती है, जिससे नए पौधे जल्दी स्थापित हो जाते हैं। रोपाई करते समय पौधों के बीच लगभग 2 × 2 मीटर की दूरी रखें ताकि उन्हें पर्याप्त रोशनी, हवा और पोषक तत्व मिलें। रोपाई के बाद हल्की सिंचाई करना जरूरी है, ताकि जड़ें अच्छी तरह से मिट्टी में जम जाएँ और पौधा मजबूत विकास कर सके।
इलायची की खेती (Elaichi Ki Kheti) में सिंचाई प्रबंधन
इलायची को लगातार नमी की जरूरत होती है, लेकिन पानी रुकना नुकसानदायक होता है। बरसात के मौसम में खेत में जल निकास का विशेष ध्यान रखें। गर्मी के मौसम में 7–10 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई करें।
ड्रिप सिंचाई से नमी संतुलित रहती है और पानी की बचत भी होती है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
इलायची लंबे समय तक चलने वाली फसल है, इसलिए संतुलित पोषण जरूरी होता है।
बेहतर वृद्धि और उत्पादन के लिए
CROP TIGER – पौधों की शक्ति और सहनशीलता बढ़ाने के लिए।
FABIANA (Microbial NPK Liquid) – मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाता है और पौधों के पोषण को संतुलित करता है।
MYCO-PEP – जड़ों की वृद्धि और मिट्टी की जैविक गतिविधि को सुधारने के लिए।
खाद को साल में दो हिस्सों में देना ज्यादा फायदेमंद रहता है। पहले हिस्से को मानसून के शुरुआत में और दूसरे हिस्से को सक्रिय वृद्धि के दौरान दें। यह पौधों को लगातार पोषण प्रदान करता है और लंबे समय तक उनकी उत्पादकता बनाए रखता है।

कीट और उनका नियंत्रण
थ्रिप्स – Fifty-O-5 0.3% (Chlorpyriphos 50% + Cypermethrin 5% EC)
माइट्स – BAREEK (Beauveria bassiana 1.15% WP)
डिफोलिएटर कैटरपिलर – Zyami (Bacillus thuringiensis kurstaki 0.50% WP)
बोर्स – Madad (Buprofezin 15% + Acephate 35% WP), DYAFIN (Diafenthiuron 47.8% SC)
रोग और उनका नियंत्रण
डैम्पिंग-ऑफ – TRICHO-PEP H (Trichoderma harzianum 2% WP)
विल्ट – CLAUN (Carbendazim 12% + Mancozeb 63% WP)
मोज़ेक – PSEUDO-PEP (Pseudomonas fluorescens 1% WP)
अर्ली कैप्सूल रॉट – PEPTILIS (Bacillus subtilis 1.5% AS)
कैप्सूल रॉट – TRICHO-PEP V (Trichoderma viride 1.5% WP) , TAL M-45 (Mancozeb 75% WP)
कटाई और सुखाना
इलायची की पहली तुड़ाई रोपाई के लगभग 2–3 साल बाद शुरू होती है। जब फलियां हल्की पीली होने लगें, तब हाथ से सावधानीपूर्वक तुड़ाई करें। तुड़ाई के बाद फलियों को छायादार जगह पर सुखाएं।अच्छी सुखाई से इलायची का रंग और खुशबू बनी रहती है, जिससे बाजार भाव बेहतर मिलता है।
निष्कर्ष
इलायची की खेती (Elaichi Ki Kheti) धैर्य और सही प्रबंधन मांगती है, लेकिन इसका रिटर्न लंबे समय तक मिलता है।
स्वस्थ पौध, संतुलित पोषण और समय पर कीट-रोग नियंत्रण से किसान इलायची से स्थायी आमदनी बना सकते हैं।
जैविक और वैज्ञानिक तरीकों का संतुलन इलायची की खेती को सुरक्षित और टिकाऊ बनाता है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
- इलायची की खेती कहां सबसे अच्छी होती है?
नमी वाली पहाड़ी और अर्ध-छायादार जगहों पर। - इलायची को कितना पानी चाहिए?
लगातार नमी जरूरी है, लेकिन जलभराव नहीं होना चाहिए। - इलायची की पहली फसल कब मिलती है?
रोपाई के 2–3 साल बाद। - इलायची में जड़ सड़न से कैसे बचाव करें?
अच्छा जल निकास रखें और TRICHO-PEP V का उपयोग करें। - इलायची की गुणवत्ता कैसे सुधारें?
संतुलित पोषण, खासकर पोटाश और माइक्रोबियल उत्पादों के उपयोग से।
