
Angur ki Kheti: अंगूर की खेती कैसे करें – पूरी जानकारी
भारत में व्यावसायिक रूप से अंगूर की खेती पिछले लगभग छः दशकों से की जा रही है। अंगूर एक महत्वपूर्ण और लाभकारी फसल है, जो भारत के विभिन्न हिस्सों में उगाया जाता है। महाराष्ट्र आज के समय में देश का सबसे बड़ा अंगूर उत्पादक राज्य है, जहाँ सबसे अधिक क्षेत्र में इसकी खेती की जाती है। इसकी खेती किसानों के लिए फायदेमंद होती है क्योंकि अंगूर का उपयोग ताजे फल के रूप में, किशमिश, और वाइन (शराब) बनाने के लिए भी किया जाता है। अंगूर की खेती में अच्छे उत्पादन के लिए उपयुक्त जलवायु, सही किस्मों का चयन और उचित खेती तकनीक का पालन आवश्यक होता है।अंगूर के पौधे नाज़ुक होते हैं और उनकी सही देखभाल ज़रूरी होती है। तो आइए इस ब्लॉग में चर्चा करते हैं कि अंगूर की खेती कैसे की जा सकती है और इसके लाभकारी होने के लिए क्या आवश्यकताएं हैं।
अंगुर की खेती (angur ki kheti) एक पुरानी परंपरा है, जो आज भी किसानों के बीच लोकप्रिय है। अच्छी उपज के लिए, अंगुर की खेती के विभिन्न पहलुओं को समझना आवश्यक है, जैसे कि मिट्टी का चयन, सिंचाई विधियाँ और कीट प्रबंधन।
अंगूर की महत्वपूर्ण किस्मे (Varieties)
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- मस्कट Muscat (Panneer)
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- पचाद्रक्षा (Pachadraksha)
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- अनाब-ए-शाही (Anab-e-Shahi)
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- थॉम्पसन सीडलेस (Thompson Seedless)
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- अर्का श्याम (Arka Shyam)
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- अर्का कंचन (Arka Kanchan)
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- अर्का हंस (Arka Hans)
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- माणिक चमन (Manik Chaman)
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- सोनाका (Sonaka)
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- शरद सीडलेस (Sharad Seedless)
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- फ्लेम सीडलेस (Flame Seedless)
अंगुर की खेती (angur ki kheti) के लिए एक कारगर जलवायु की आवश्यकता होती है। गर्म और शुष्क मौसम इस फसल के विकास के लिए अनुकूल होते हैं।
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अंगूर की खेती के लिए मिट्टी और जलवायु
यह फसल अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ, दोमट मिट्टी (loam soil) में सबसे अच्छी होती है जिसका pH 6.5 – 7.0 और EC 1.0 से कम हो। शुष्क मौसम और हल्की ठंड फल की क्वालिटी और उपज को बेहतर बनाता है।
अंगुर की खेती में रोपण की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। सही तरीके से रोपण करने से फसल का विकास बेहतर होता है।
अंगुर की खेती में पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखना आवश्यक है ताकि पौधों को पर्याप्त sunlight और nutrients मिल सकें।
खेत की तैयारी और रोपण
मस्कट के लिए 0.6 मीटर चौड़ाई और 0.6 मीटर गहराई के गड्ढे 3 मीटर की दूरी पर और अन्य किस्मों के लिए 1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर के गड्ढे खोदे जाने चाहिए। अच्छी तरह से सड़ी हुई FYM या कम्पोस्ट या हरी पत्ती की खाद को गड्ढों में डाल देना चाहिए और फिर मिट्टी से ढक देना चाहिए। जून-जुलाई में अंगूर की जड़ वाली कटिंग लगाएँ।
अंगुर की खेती (angur ki kheti) में प्रति एकड़ उचित पौधों की संख्या का पालन करना चाहिए, ताकि फसल की उपज में वृद्धि हो सके।
पौधों के बीच की दूरी (Spacing)
अंगुर की खेती में सिंचाई के सही तरीके अपनाने से फसल की गुणवत्ता में भी सुधार होता है।
मस्कट के लिए कतार से कतार की दूरी 3 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 2 मीटर और अन्य किस्मों के लिए कतार से कतार की दूरी 4 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 3 मीटर सही होती है।
अंगुर की खेती में बेलों को ट्रेन करने से फसल का उत्पादन बढ़ता है। सही प्रशिक्षण तकनीकें अपनाना महत्वपूर्ण है।
प्रति एकड़ पौधों की संख्या
अंगुर की खेती (angur ki kheti) में छंटाई का महत्व होता है। उचित छंटाई तकनीकों से फसल का विकास अधिकतम होता है।
अंगुर की खेती (angur ki kheti) में विशेष प्रथाओं का पालन करना आवश्यक है, जिससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में वृद्धि हो सके।
अंगूर की खेती में प्रति एकड़ 500 से 600 पौधे लगाए जाने चाहिए। पौधों के बीच और कतारों की बीच की दूरी का ध्यान रखना चाहिए ताकि उनके विकास पर असर न पड़े और हवा और प्रकाश ठीक से मिल सके।
सिंचाई (Irrigation)
पौधों की अच्छी ग्रोथ के लिए सही पानी की जरूरत होती है। पानी की उचित मात्रा और समय निर्धारित करता है की फसल में कितनी पैदावार होगी। पौधे लगाने के तुरंत बाद और उसके बाद तीसरे दिन पानी देना चाहिए। जब पौधे थोड़े बड़े हो जाये तो हर सप्ताह पानी दें। छंटाई से 15 दिन पहले और कटाई से 15 दिन पहले सिंचाई रोक दें ताकि पौधे में बीमारियों का खतरा कम हो जाये।
अंगूर बेल प्रशिक्षण (Training)
बेलों को सही दिशा में बढ़ाने के लिए सहारे के साथ प्रशिक्षित (train) किया जाता है और 2 मीटर की ऊँचाई पर शाखाएँ बढ़ाई जाती हैं। मुख्य शाखाओं को विपरीत दिशाओं में विकसित और प्रशिक्षित किया जाता है। आगे की टिप पर द्वितीयक और तृतीयक नई छोटी शाखाएँ निकलती हैं, जो चारों तरफ फैलती हैं।
छंटाई (Pruning)
आमतौर पर मस्कट, पचाद्रक्षा, बैंगलोर ब्लू, अनाब-ए-शाही और अर्का हाइब्रिड के लिए चार कली तक छंटाई की जाती है, जबकि थॉम्पसन सीडलेस के लिए दो कली तक छंटाई उपयुक्त होती है। कली पूर्वानुमान तकनीक (Bud Forecasting Technique) के अनुसार छंटाई का स्तर तय करना बेहतर है। कली पूर्वानुमान तकनीक (Bud Forecasting Technique) एक वैज्ञानिक तरीका है, जिसके जरिए यह अनुमान लगाया जाता है कि किस कली से नई शाखाएं, फूल या फल निकलेंगे और किससे नहीं। वनस्पति विकास (Vegetative growth) को बढ़ाने के लिए कमजोर और आधी पकी हुई शाखाओं को 1-2 कली तक काटना चाहिए। गर्मियों की किस्मों में छंटाई दिसंबर-जनवरी में और कटाई अप्रैल-मई में की जाती है। मानसून की किस्मों में छंटाई मई-जून में और कटाई अगस्त-सितंबर में की जाती है।
विशेष प्रथाएँ (Special practices)
फल लगने के बाद टहनियों की टिपिंग और गुच्छों को पंडाल में बांधना चाहिए। 12 से 15 अक्षीय कलियों (axillary buds) और टर्मिनल कलियों की बढ़ती हुई टहनियों को काट दें। मटर के आकार की अवस्था में 20% बेरियों को हटाकर कॉम्पैक्ट गुच्छों में फल छांट देना चाहिए।
फल लगने के 10-12 दिन बाद गुच्छों को MASTER BERRY (Forchlorfenuron CPPU 0.1% Liquid) के घोल में डुबोएं ताकि शक्ति, उपज और गुणवत्ता के मापदंडों को बनाया रखा जा सके। फसल की वृद्धि के लिए बायोस्टिमुलेंट जैसे अमिनोफर्ट गोल्ड (AMINOFERT GOLD LIQUID) का उपयोग करें। बढ़िया उपज के लिए इसकी मात्रा 400 से 600 ml प्रति एकड़ रखें। इसमें अमीनो एसिड, कार्बन और सूक्ष्म पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। यह मिट्टी और फसलों के लिए एक बेहतरीन पोषण स्रोत है। पौधे के विकाश के लिए PEP-GIBB 40 (Gibberellic Acid 40% WSG) जैसे ग्रोथ रेगुलेटर का छिड़काव फसल लगाने के 25 से 30 दिन बाद करें। इसकी मात्रा 6 gram से 8 gram प्रति एकड़ रखना उत्तम होता है।
| उत्पाद | डोज़ | समय |
| MASTER BERRY (Forchlorfenuron (CPPU) 0.1% Liquid) | 2-10 ml/ltr पानी | रोपण के 25-30 दिन बाद |
| अमिनोफर्ट गोल्ड (AMINOFERT GOLD LIQUID) | 400-600 ml/एकड़ | फूल आने से पहले और फल विकास के समय |
| PEP-GIBB 40 (Gibberellic Acid 40% WSG) | 6-8 gm | रोपण के 25 से 30 दिन बाद |
पौधों की सुरक्षा
कीट
पिस्सू भृंग (Flea beetles), थ्रिप्स, मीली बग
BAREEK (Beauveria bassiana) 5 मिली/लीटर पानी का छिड़काव करें और हर 8-10 दिन में दोहराएं। इस कीट को अंडे देने से रोकने के लिए छंटाई के समय ढीली छाल को हटाया जा सकता है।
रोग
अंगुर की खेती (angur ki kheti) का संक्षिप्त विवरण यह है कि यह एक लाभकारी फसल है, जिसमें उचित प्रबंधन से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
पाउडरी फफूंद
फफूंद को नियंत्रित करने के लिए सुबह के समय Peptilis (Bacillus subtilis) @ 2-5 लीटर/एकड़ या Sulph-Pep (Sulphur 80% WDG) का 20-25 ग्राम/एकड़ के दर से छिड़काव करें।
एन्थ्रेक्नोज व डाउनी फफूंद
CHLOPER (Copper Oxychloride 50% WP) का 1 किलोग्राम/एकड़ के दर से छिड़काव करें। मौसम की स्थिति के आधार पर छिड़काव की संख्या बढ़ाएं।
फलों की तुड़ाई और समय
अंगूर की फसल की तुड़ाई 120-150 दिनों में की जाती है, जब फल पूर्ण रूप से पक जाते हैं। कटाई का समय क्षेत्र की जलवायु और किस्म के अनुसार भिन्न हो सकता है, लेकिन आमतौर पर मार्च से मई तक इसकी कटाई की जाती है।
अंगूर की फसल का प्रति एकड़ उत्पादन
अंगूर की फसल का उत्पादन प्रति एकड़ 8 से 12 टन हो सकता है, जो किस्म, जलवायु, और खेती के तरीकों पर निर्भर करता है। उचित प्रबंधन और सही तकनीक के साथ उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
सारांश
अंगुर की खेती (angur ki kheti) भारत के अनेक क्षेत्रों में की जाती है और यह किसानों के लिए एक लाभकारी फसल है। इस फसल की खेती के लिए शुष्क और गर्म जलवायु, उचित खेत की तैयारी और सही किस्मों का चयन अत्यधिक महत्वपूर्ण है। उचित देखभाल, खाद और उर्वरक प्रबंधन, कीट और रोगों की पहचान और नियंत्रण आवश्यक होते हैं। किसान सुरक्षित खेती कर अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं।
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