गोभी की खेती – बेहतर आय के लिए लाभदायक फसल

गोभी की खेती

भारत में सब्ज़ियों की खेती में गोभी (Cauliflower) एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह ठंडी मौसम की
फसल है और लगभग हर राज्य में अलग-अलग समय पर उगाई जाती है। गोभी की पत्तियों और
फूलों का उपयोग सब्ज़ियों के रूप में किया जाता है और इसकी बाजार में हमेशा मांग रहती है। यही
कारण है कि किसान इस फसल को अपनी आय बढ़ाने के लिए प्राथमिकता देते हैं।

गोभी की खेती के लिए भूमि और जलवायु

गोभी ठंडी जलवायु की फसल है। इसका सबसे अच्छा उत्पादन 18°C से 25°C तापमान में होता है। अधिक
गर्मी या अधिक ठंड फसल को नुकसान पहुंचा सकती है।
मिट्टी हल्की दोमट या बलुई दोमट होनी चाहिए, जिसमें नमी का संतुलन बना रहे। मिट्टी का pH 6.0 से 7.5 के
बीच होना फसल के लिए उपयुक्त है। भारी और जलभराव वाली मिट्टी में जड़ें विकसित नहीं हो पातीं और
पौधे कमजोर हो जाते हैं।

गोभी की खेती के लिए भूमि की तैयारी और बीज चयन

भूमि की तैयारी:

खेत की अच्छी जुताई बहुत जरूरी है। पहली जुताई मिट्टी को पलटने वाले हल या रोटावेटर से करें ताकि
मिट्टी भुरभुरी और जल निकासी योग्य बन सके। इसके बाद दो और हल्की जुताई करें और मिट्टी में खाद
मिलाएं।

बीज चयन:

स्वस्थ, रोगमुक्त और उच्च गुणवत्ता वाले बीज का चयन करें। बीज अंकुरित होने योग्य और सही आकार का होना चाहिए। बीज की कटाई के बाद उसे ट्रैटमेंट देना जरूरी है, ताकि फफूंद जनित रोग और मिट्टी के कीटों
से सुरक्षा मिल सके।

बीज उपचार के लिए उपयोगी उत्पाद:

● TRICHO-PEP V (Trichoderma viride) – बीज और मिट्टी पर फफूंदजनित रोगों से सुरक्षा।
● BAREEK (Beauveria bassiana) – मिट्टी में मौजूद कीट जैसे सफेद गिडार और दीमक से सुरक्षा।

बुवाई का समय और तरीका

उत्तर भारत में गोभी की बुवाई जुलाई से अक्टूबर तक की जाती है, जबकि दक्षिण भारत में यह सितंबर से
जनवरी तक उपयुक्त होती है।
पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45–60 cm और पौधे से पौधे की दूरी 30–40 cm रखें। बीज को 1–2 cm की गहराई
में बोना चाहिए। अंकुरण और शुरुआती विकास के लिए मिट्टी में नमी बनी रहना जरूरी है।

गोभी की खेती में सिंचाई प्रबंधन

गोभी की फसल नमी के प्रति संवेदनशील होती है। पहली सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद करें। उसके बाद मिट्टी
की स्थिति देखकर हर 7–10 दिन पर सिंचाई करें। फूल बनने और गोभी का बॉल (फूल का सिर) बनने के
समय पानी की कमी नहीं होने दें। खेत में पानी जमा न होने दें, अन्यथा जड़ सड़ सकती है और पैदावार कम हो
सकती है।

खाद एवं पोषण प्रबंधन

गोभी पोषक तत्वों के लिए संवेदनशील फसल है। संतुलित उर्वरक प्रबंधन से ही पौधों की वृद्धि, फूलों की
संख्या और बॉल का आकार सही रहता है।

सुझावित खाद योजना:

● बुवाई से पहले: 15–20 टन गोबर की सड़ी हुई खाद।

● नाइट्रोजन (N) – 75–100 किलो/एकड़ (1/2 बुवाई समय, 1/2 30–40 दिन बाद)।
● फॉस्फोरस (P2O5) – 50–60 किलो/एकड़।
● पोटाश (K2O) – 40–50 किलो/एकड़।

अनुशंसित जैविक/बायोस्टिमुलेंट उत्पाद:

● AMINOFERT 77 – पौधों की वृद्धि और जड़ों के विकास के लिए।
● Bayani (Potassium source from Rhodophytes) – फूल और बॉल के आकार और गुणवत्ता
में सुधार।
FABIANA (Bio-NPK Liquid) – मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद।

गोभी की खेती में कीट और रोग प्रबंधन

श्रेणी मुख्य कीट/रोग प्रमुख लक्षण नियंत्रण के लिए उत्पाद
कीट गोभी पतंगा (Diamondback moth) पत्तियों में छेद, जाल जैसी बनावट, पौधे की बढ़वार रुकना PEPORA (Chlorantraniliprole 18.5% SC)
कीट सफेद मक्खी (Whitefly) कोमल पत्तियों पर झुंड, रस चूसना, पत्तियाँ मुड़ना PEPMIDA 30 (Imidacloprid 30.5% SC)
कीट एफिड (Aphid) पत्तियों का पीला पड़ना, चिपचिपा पदार्थ, कमजोर पौधा TRIOMETHOXAM 25 (Thiamethoxam 25% WG)
कीट जैसिड (Jassid ) पत्तियों के किनारों से पीला पड़ना, बाद में भूरा जलना, Pepmida 70 (Imidacloprid 70% WG)
रोग ब्लाइट (Early & Late Blight) पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे, सूखना Strobit (Trifloxastrobin 25% + Tebuconazole 50% wdg)
रोग पत्तियों पर फफूंदी (Downy mildew) पत्तियों के नीचे सफेद फफूंद, पीले धब्बे Tirran (Azoxystrobin 23% SC)
रोग बॉट्राइटिस सड़न, फूल व पत्तियों का झड़ना Tosem 70 (Thiophanate Methyl 70% WP)

गोभी की फसल की कटाई

गोभी की बॉल लगभग 70–90 दिन में तैयार हो जाती है। जब फूल का सिर (बॉल) ठोस और सफेद-हल्का
हरा दिखाई दे, और पत्तियाँ फैलकर बॉल को ढकें, तब कटाई करें। कटाई के बाद बॉल को हल्के छायादार
स्थान पर रखें और ठंडी, हवादार जगह पर स्टोर करें।

निष्कर्ष

गोभी की खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो यह किसानों के लिए आय बढ़ाने वाली फसल साबित होती
है। सही बीज, संतुलित पोषण, कीट और रोग प्रबंधन से उच्च गुणवत्ता और उत्पादन सुनिश्चित किया जा
सकता है। जैविक उत्पादों का इस्तेमाल मिट्टी की सेहत बनाए रखता है और पर्यावरण के अनुकूल खेती को
बढ़ावा देता है।