चने की खेती कैसे करें? जलवायु, बीज, खाद और कीट-रोग प्रबंधन की पूरी जानकारी

चने की खेतीचने की खेती एक महत्त्वपूर्ण और लोकप्रिय दलहनी रबी फसल है। चने की खेती कम पानी में भी अच्छा मुनाफा दे सकती है। चना मिट्टी में नाइट्रोजन फिक्सेशन करके मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा भी बढ़ाता है। चने की खेती विशेषकर मध्यभारत और उत्तरभारत में बहुत प्रचलित है क्योंकि मौसम और मिट्टी यहाँ चने की खेती के अनुकूल रहती है। भारत में दो तरह के चने की खेती की जाती है जो की है देसी चना (Desi chickpea) और काबुली चना (Kabuli chickpea)। देसी चना छोटे आकार का और भूरे रंग का होता है जबकि काबुली चना थोड़ा बड़ा और हल्के रंग का होता है।

चने की खेती के लिए जलवायु (Climate Requirement)

चना ठंडी और शुष्क जलवायु में अच्छी पैदावार देता है। इसके लिए 20 से 27℃ तापमान सबसे उपयुक्त होता है। अधिक ठंड या पाला (frost) फसल को नुकसान पहुँचा सकता है, खासकर फूल और फल लगने के समय में। अधिक नमी या लगातार वर्षा से फफूंद वाली बिमारिओं का खतरा बढ़ जाता है। इसके लिए रेतीली दोमट मिट्टी से चिकनी दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त रहती है। मिट्टी में जल भराव नहीं होना चाहिए  या मिट्टी क्षारीय नहीं होनी चाहिए।

चने की खेती के लिए खेत की तैयारी (Land Preparation)

खेती की तैयारी करने के लिए सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से एक बार गहरी जुताई करें उसके बाद दो से तीन बार देसी हल या रोटावेटर से जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी करलें। आखिरी जुताई के समय पांच से छे टन प्रति एकर गोबर की सड़ी हुई खाद मिलायें।

चने की खेती के बेसिक नियम

मापदंड सुझाव
बुवाई का समय बारिश पर निर्भर करता है पर सामान्यतः अक्टूबर और नवंबर में बुवाई आदर्श होती है
बीज दर देसी चना: 30-35 किलोग्राम बीज प्रति एकड़

काबुली चना: 40-45 किलोग्राम बीज प्रति एकड़

दूरी पंक्ति से पंक्ति 30 से 40 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दुरी 10 सेंटीमीटर पैदावार के हिसाब से समायोजित
बुवाई गहराई 5 से 7 सेंटीमीटर, मिट्टी के प्रकार पर भी निर्भर करता है
सिचाई अंकुरण के बाद पानी तभी दें जब मिट्टी सूखी लगे, अधिक पानी समस्या बनता है

बुवाई और बीज उपचार

बीज की बुवाई से पहले बीज उपचार बहुत ही आवश्यक है बीज पर UZOTO या TRICHO PEP V के साथ भी उपचार कर सकते है ताकि नाइट्रोजन फिक्सेशन और बीमारी प्रतिरोध बढ़े। बीज उपचार के लिए Titan Agritech के TRIOMETHOXAM 30 से सीड ट्रीटमेंट किया जा सकता है ये शुरुआती समय में लगने वाले कीटों और मिट्टी में होने वाले नुकसान से सुरक्षा देता है।

चने की खेती के लिए खरपतवार प्रबंधन (Weed management)

चना की फसल में शुरुआती 30 से 40 दिन में खरपतवार को नियंत्रित करना सबसे जरूरी होता है क्योंकि यही समय है जब पौधे धीरे बढ़ते है और खरपतवार मिट्टी से सारा पोषण और नमी ले लेते है। समय पर खरपतवार को न रोकने से पैदावार 25 से 30 प्रतिशत तक घट सकती है। बीज बुवाई के बाद प्री-इमर्जेंस हर्बिसाइड जैसे BULDAN CS का छिड़काव लाभकारी रहता है। अगर खेत में बाद में खरपतवार उग आएं तो हल्की गुड़ाई या हेंड होइंग कर सकते हैं। साथ ही पंक्ति से पंक्ति उचित दूरी रखने से खरपतवार प्रबंधन आसान हो जाता है।

चने की खेती के लिए सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)

चना कम पानी वाली फसल है पर सही समय पर सिंचाई करने से पैदावार में काफी वृद्धि होती है। सामान्यत: 2-3 सिंचाई पर्याप्त होती है। पहली सिंचाई फूल आने की अवस्था में और दूसरी सिंचाई दाने भरने की अवस्था में करनी चाहिए। शुरुआती समय में पानी की जरूरत नहीं होती क्योंकि ज्यादा नमी से जड़ गलने (root rot) की परेशानी आती है। खेत में पानी का निकास (drainage) अच्छा होना चाहिए।

चने की खेती के लिए पोषण प्रबंधन (Nutrient management)

चना एक लेग्युम है और मिट्टी से खुद नाइट्रोजन लेने में समर्थ होता है पर फसल के अच्छे विकास के लिए दूसरे नुट्रिएंट्स जैसे फॉस्फोरस और पोटेशियम की जरूरत को पूरा करना आवश्यक है। जैविक और माइक्रोबियल अप्रोच प्रभावी रहता है। Titan Agritech का FABIANA (Liquid Microbial Consortium) पौधे की जड़ों के आसपास नाइट्रोजन फिक्स करने वाले और फॉस्फोरस सुलभ करने वाले सूक्ष्मजीव देता है जिससे पौधे जल्दी बढ़ते हैं और पोषक अवशोषण बेहतर होता है। साथ ही मिट्टी में माइकोराइज़ा जैसे MYCOPEP ग्रैन्यूल रूट सिस्टम मजबूत करते हैं और सूखा सहनशीलता बढ़ाते हैं। इन उत्पादों का सही समय पर और निर्देशानुसार उपयोग लाभदायक होता है।

रोग और कीट प्रबंधन (Pest and Disease Management)

चना की फसल में कई तरह के कीट और रोग लगते हैं, जिनका समय पर नियंत्रण करना जरूरी है।

कीट और उत्पाद सुझाव


चने में सबसे बड़े कीटों में पोड बोरर और लेपिडॉप्टेरा वर्ग के कैटरपिलर आते हैं और कुछ स्थितियों में एफिड्स भी नुकसान कर देते हैं। इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट अपनाएं जहां जैविक विकल्प पहले रखें। Titan Agritech के NIIMPA 3000(Azadirachtin) आधारित बायोपेस्टिसाइड प्राकृतिक और लाभकारी कीटों के लिए सुरक्षित विकल्प है। भारी अटैक में Chlorantraniliprole आधारित PEPORA जैसे डायामाइड श्रेणी के प्रोडक्ट कैटरपिलर (हेलिकोवर्पा आर्मिजेरा) कंट्रोल में कारगर साबित होते हैं क्योंकि यह खाने पर कीट को रोकता है और लंबे समय तक सुरक्षा देता है। 

मुख्य रोग

मुरझाना (Wilt): Fusarium oxysporum से होता है, जिससे पौधे अचानक मुरझा जाते हैं।

नियंत्रण: रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ें और फसल चक्र (crop rotation) अपनाएं। बीज उपचार TRICHO-PEP H से करें।

चित्तीदार झुलसा (Blight): Ascochyta rabiei से होता है।

नियंत्रण: फफूंदनाशी CLAUN का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

जड़ गलन (Root rot): अधिक नमी और जलभराव से फैलता है।

नियंत्रण: मिट्टी का ड्रेनेज सही रखें और जैविक फफूंदनाशी जैसे TRICHO-PEP V का प्रयोग करें।

खास प्रैक्टिसेस जो फर्क बनाती हैं

  1. समय पर और लाइन बुवाई करें ताकि पंक्तिओं के बीच कटाई और निराई आसान रहे।
  2. राइस या गेहूँ के साथ रोटेशन रखें ताकि बीमारी और कीट का प्रेशर कम रहे।
  3. Rhizobium इनोक्यूलेशन और माइक्रोबियल बायोफर्टिलाइजर से जड़ नाइट्रोजन बढ़ाएं।
  4. मिट्टी नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग करें और जहाँ पानी की कमी हो वहाँ ड्रिप सिंचाई पर विचार करें।
  5. फसल की नियमित रूप से निगरानी करते रहें और आवश्यकता पड़ने पर ही स्प्रे करें ताकि प्रतिरोध विकास न हो। इन बिंदुओं का पालन चने की खेती में खास असर दिखाता है।
  6. निपिंग (Nipping): जब पौधे में 5 से 6 शाखाएं आ जाएं तो ऊपर की नोक तोड़ देना चाहिए। इससे पौधे में अधिक शाखाएं और फली लगती है और उपज बढ़ती है।

कटाई और भंडारण

परिपक़्वता आने तक फसल का ध्यान रखें। जब पत्तियां पीली होने लगे और दाने कठोर हों तब फसल काट लें। कटाई के बाद फलों को सुखाकर ही प्लास्टिक या जूट में रखें। भंडारण से पहले दाने की नमी कम रखें ताकि फफूंद और कीट से नुकसान न हो।

निष्कर्ष

चने की खेती सही समय और सही उत्पादों के साथ सरल और लाभदायक है। चने की खेती में माइक्रोबियल उर्वरक और जैविक विकल्पों को मौका दें। चने की खेती में ध्यान रखें कि ज्यादा रसायन एक ही तरह के बार-बार न लगायें ताकि कीट प्रतिरोध न बन पाए। चने की खेती अपनाइए और छोटे बदलाव से अच्छी उपज और बेहतर मुनाफा देखिए। चने की खेती से जुड़े किसी भी खास सवाल के लिए आप अपने नजदीकी कृषि विभाग या Titan Agritech के प्रोडक्ट पेज पर दिए निर्देश देख सकते हैं।

Frequently Asked Questions (FAQs)

Q1: चना बोने का सही समय कब है?


A: आमतौर पर अक्टूबर और नवंबर में चना बोना सबसे अच्छा रहता है। कुछ किसान बारिश खत्म होते ही जल्दी बो देते है पर ठंडी मौसम में अंकुरण और विकास अच्छा होता है।

Q2: चने की बुवाई के लिये कितनी बीज की मात्रा लगती है?


A: देसी किस्म के लिये लगभग 60 से 90 किलो बीज प्रति हेक्टर काफी होता है। पर बीज का साइज और खेत की स्थिति के हिसाब से थोड़ा ऊपर नीचे कर सकते है।

Q3: चना में खरपतवार कैसे कंट्रोल करे?


A: बुवाई के 30 से 40 दिन तक खरपतवार निकालना बहुत जरूरी है। बुवाई के बाद प्री-इमर्जेंस हर्बिसाइड जैसे BULDAN CS डाल सकते है और बाद में हल्की गुड़ाई कर देना अच्छा रहता है।

Q4: चना की फसल को कौन सा खाद देना अच्छा रहता है?


A: चना खुद नाइट्रोजन ले लेता है पर फॉस्फोरस और पोटाश देना जरूरी है। साथ में बायो फर्टिलाइजर जैसे FABIANA और MYCOPEP यूज करेंगे तो पौधा और जड़ मजबूत बनेगा।

Q5: चना में सबसे ज्यादा कौन से कीट नुकसान करते है?


A: पोड बोरर और कैटरपिलर बहुत नुकसान करते है। हल्के अटैक में NIIMPA जैसे नीम आधारित प्रोडक्ट यूज कर सकते है और ज्यादा अटैक हो तो PEPORA जैसे कीटनाशी सही रहेगा।

Q6: चने की फसल काटने का समय कैसे पता चलेगा?


A: जब पौधे की पत्तियाँ पीली हो जाये और दाना अंदर से कठोर हो जाये तो कटाई का टाइम हो जाता है। कटाई के बाद दानों को अच्छे से सुखाकर ही स्टोर करे।

Q7: क्या चना में निपिंग करना जरूरी है?


A: हाँ, जब पौधे में 5 से 6 शाखा आ जाये तो ऊपर का सिरा तोड़ देना चाहिए। इससे ज्यादा शाखा और फलियाँ लगते है और पैदावार बढ़ जाती है।